क्यों होती है Maa Brahmacharini की पूजा? जानिए Puja Vidhi और की रहस्यमयी कथा
Maa Brahmacharini: चैत्र नवरात्रि 2026 का दूसरा दिन 20 मार्च, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। यह स्वरूप तप, त्याग, साधना और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करता है, उसके जीवन में धैर्य, संयम और आत्मविश्वास बढ़ता है।
इस दिन की तिथि चैत्र शुक्ल पक्ष की द्वितीया है, जो देर रात 02:31 बजे तक रहेगी। खास बात यह है कि इस दिन हरे रंग का विशेष महत्व होता है, जिसे शांति, विकास और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इसलिए भक्त इस दिन हरे रंग के वस्त्र पहनकर पूजा करते हैं।
अगर ग्रह-नक्षत्र की बात करें, तो इस दिन ब्रह्म योग रात 10:15 बजे तक रहेगा, जो बेहद शुभ माना जाता है। वहीं रेवती नक्षत्र देर रात 02:28 बजे तक रहेगा। इस दिन चंद्र दर्शन और सिंदारा दूज जैसे खास पर्व भी मनाए जाते हैं, जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है।
मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप और अर्थ
“ब्रह्मचारिणी” नाम ही अपने आप में गहरा अर्थ लिए हुए है। ब्रह्म का मतलब है तप या साधना, और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली। यानी मां ब्रह्मचारिणी वह देवी हैं जो कठोर तप और साधना का प्रतीक हैं। उनके दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल होता है, जो ज्ञान और तपस्या का संकेत देता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन साधक अपने मन को मां के चरणों में लगाकर साधना करते हैं। यह दिन कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने के लिए भी बेहद खास माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन साधना करने से व्यक्ति के जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और उसे अपने लक्ष्य तक पहुंचने की शक्ति मिलती है।
Puja Vidhi: कैसे करें मां की आराधना
इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद हरे रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। घर के पूजा स्थान को साफ करके मां ब्रह्मचारिणी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
इसके बाद मां को फूल, अक्षत, रोली और चंदन अर्पित करें। भोग में दूध, दही और घी चढ़ाया जाता है, क्योंकि ये पवित्रता और शुद्धता का प्रतीक होते हैं। पूजा के दौरान “ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः” मंत्र का जाप करना चाहिए और मां की आरती करनी चाहिए।
पूजा का फल: क्या मिलता है आशीर्वाद
मां ब्रह्मचारिणी की उपासना से व्यक्ति के जीवन में तप, त्याग, संयम और सदाचार की भावना विकसित होती है। कठिन परिस्थितियों में भी उसका मन डगमगाता नहीं है और वह अपने कर्तव्य पथ पर मजबूती से बना रहता है।
मान्यता है कि मां की कृपा से भक्त को हर क्षेत्र में सफलता और विजय प्राप्त होती है। यह दिन आत्मबल और मानसिक शक्ति को बढ़ाने का भी अवसर देता है।
भ्रामरी देवी की रहस्यमयी कथा
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के साथ ही देवी के एक और अद्भुत रूप भ्रामरी देवी की कथा भी जुड़ी हुई है। भ्रामरी देवी को मधुमक्खियों और भौंरों की देवी कहा जाता है। यह देवी तब प्रकट हुईं जब अरुणासुर नामक राक्षस ने देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया था।
उसे ऐसा वरदान मिला था कि उसे कोई भी अस्त्र-शस्त्र, देवता या मनुष्य नहीं मार सकता। तब देवी ने अपने शरीर से असंख्य मधुमक्खियां और भौंरे उत्पन्न किए, जिन्होंने मिलकर उस राक्षस का वध कर दिया। इस रूप में देवी को नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाली माना जाता है।
आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम में स्थित भ्रमराम्बा मंदिर को भ्रामरी देवी का प्रमुख शक्तिपीठ माना जाता है, जहां माता सती की ग्रीवा गिरी थी। यहां आज भी हजारों श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
भ्रामरी प्राणायाम से जुड़ा संबंध
योग शास्त्र में भ्रामरी प्राणायाम का नाम भी इसी देवी के नाम पर रखा गया है। इस प्राणायाम में सांस छोड़ते समय मधुमक्खी जैसी गुंजन ध्वनि निकाली जाती है। यह अभ्यास मन को शांत करने, तनाव कम करने और एकाग्रता बढ़ाने में बेहद मददगार माना जाता है।
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