Manikarnika Ghat को दुनिया के सबसे पुराने श्मशान घाटों में गिना जाता है
काशी को यूं ही मृत्यु पर विजय पाने वाला शहर नहीं कहा जाता। मान्यता है कि जो काशी में मरता है, वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। इसी काशी में स्थित है Manikarnika Ghat—एक ऐसा श्मशान घाट, जिसे हिंदू धर्म में मोक्ष का द्वार माना जाता है। यह घाट न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि इतिहास, परंपरा और हालिया विवादों के कारण भी लगातार चर्चा में रहता है।
Manikarnika Ghat सबसे प्राचीन श्मशान घाटों में एक
Manikarnika Ghat को दुनिया के सबसे पुराने श्मशान घाटों में गिना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, इस घाट का अस्तित्व कम से कम 2500 से 3000 वर्ष पुराना है। प्राचीन ग्रंथों और ऐतिहासिक संदर्भों में भी मणिकर्णिका का उल्लेख मिलता है।
हालांकि, आज जो घाट का स्वरूप दिखाई देता है—पत्थर की सीढ़ियां, पक्के घाट और संरचनाएं—वे मुख्य रूप से मध्यकालीन दौर में विकसित हुईं। माना जाता है कि गुप्त काल में घाट का विस्तार शुरू हुआ, जबकि 18वीं शताब्दी में मराठा शासन के दौरान इसका बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण और संरक्षण हुआ।
अहिल्याबाई होल्कर का योगदान
इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर को Manikarnika Ghat सहित काशी के कई घाटों और मंदिरों के जीर्णोद्धार का श्रेय दिया जाता है। धार्मिक आस्था और जनकल्याण के लिए किए गए उनके कार्यों के कारण आज भी काशी में उनका विशेष सम्मान किया जाता है। मणिकर्णिका घाट के वर्तमान स्वरूप को संवारने में उनका योगदान ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
नाम के पीछे की पौराणिक कथा
“मणिकर्णिका” नाम अपने आप में एक पौराणिक कथा समेटे हुए है। पुराणों के अनुसार, जब भगवान विष्णु यहां तपस्या कर रहे थे, तब भगवान शिव और माता पार्वती भी इस स्थान पर आए। इसी दौरान माता पार्वती की कर्णिका यानी कान की बाली यहां गिर गई। उसी घटना की स्मृति में इस घाट का नाम मणिकर्णिका पड़ा।
यहीं स्थित मणिकर्णिका कुंड को सृष्टि के सबसे प्राचीन जलस्रोतों में से एक माना जाता है, जिसे लेकर धार्मिक मान्यताएं बेहद गहरी हैं।
क्यों मिलता है यहां मोक्ष?
हिंदू धर्म में यह विश्वास प्रचलित है कि जो व्यक्ति Manikarnika Ghat पर अंतिम संस्कार पाता है, उसे पुनर्जन्म से मुक्ति मिल जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के समय भगवान शिव स्वयं मृत आत्मा के कान में तारक मंत्र का उपदेश देते हैं। इसी वजह से मणिकर्णिका घाट को “मोक्ष का द्वार” कहा जाता है।
यह घाट कभी शांत नहीं होता। यहां चिताओं की अग्नि दिन-रात जलती रहती है और कहा जाता है कि यह अग्नि सदियों से कभी बुझी नहीं है।
डोम समुदाय और अघोरी परंपरा
Manikarnika Ghat की पहचान डोम समुदाय से भी जुड़ी है। पीढ़ियों से यही समुदाय यहां अंतिम संस्कार की अग्नि देने का कार्य करता आ रहा है। डोम राजा को आज भी यहां प्रतीकात्मक अधिकार प्राप्त हैं।
इसके अलावा, घाट पर अघोरी साधुओं की उपस्थिति भी देखने को मिलती है। अघोरी साधु मृत्यु को भय नहीं, बल्कि जीवन का अंतिम सत्य मानते हैं। उनके लिए श्मशान अंत नहीं, बल्कि साधना का स्थल है।
आधुनिक समय और इलेक्ट्रिक शवदाह
पर्यावरण संरक्षण और लकड़ी की बढ़ती खपत को देखते हुए सरकार ने मणिकर्णिका घाट पर इलेक्ट्रिक शवदाह गृह की शुरुआत की। हालांकि, परंपरावादियों ने इसका विरोध किया। उनका मानना है कि पारंपरिक चिता से ही आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है और मशीन से किया गया दाह संस्कार धार्मिक दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। इसी कारण आज भी अधिकांश लोग लकड़ी की चिता को ही प्राथमिकता देते हैं।
हालिया विवाद: आस्था बनाम विकास
पिछले कुछ वर्षों में मणिकर्णिका घाट काशी विश्वनाथ कॉरिडोर परियोजना के कारण विवादों में रहा। परियोजना के तहत घाट से जुड़े कुछ पुराने ढांचों को तोड़ने और पुनर्विकास की योजना बनाई गई। इसका स्थानीय पंडों और डोम समुदाय ने विरोध किया। आरोप लगा कि हजारों साल पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से छेड़छाड़ की जा रही है।
सोशल मीडिया पर इसे “आस्था बनाम विकास” की लड़ाई के रूप में देखा गया। वहीं प्रशासन का कहना रहा कि रेनोवेशन का उद्देश्य घाट को सुरक्षित, स्वच्छ और सुव्यवस्थित बनाना है, न कि उसकी आत्मा को बदलना।
रील संस्कृति और नई चिंता
हाल के समय में मणिकर्णिका घाट पर सोशल मीडिया रील्स और वीडियो बनाने को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ। अंतिम संस्कार जैसे संवेदनशील दृश्यों को कंटेंट बनाने पर स्थानीय लोगों ने कड़ी आपत्ति जताई। इसके बाद प्रशासन ने घाट पर वीडियोग्राफी और रील बनाने पर सख्ती बढ़ा दी।
मृत्यु नहीं, जीवन का सत्य
मणिकर्णिका घाट केवल श्मशान नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा सत्य सिखाने वाला स्थान है। यह बताता है कि राजा हो या रंक, अंत में सभी समान हैं। काशी में कहा जाता है—“जो यहां मरा, वो फिर नहीं जन्मा।”
मणिकर्णिका घाट आज भी उस विश्वास, आस्था और परंपरा की जलती हुई साक्षी बना हुआ है।







