अदालत ने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत Ram Rahim सिंह को इस मामले में बरी कर दिया है।
करीब दो दशक पुराने चर्चित पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत Ram Rahim सिंह को इस मामले में बरी कर दिया है। हालांकि कोर्ट ने तीन अन्य आरोपियों—कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल—की सजा को बरकरार रखा है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उपलब्ध सबूतों के आधार पर राम रहीम के खिलाफ साजिश रचने की बात पर्याप्त रूप से साबित नहीं हो पाई। इसी कारण उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया। वहीं बाकी तीन दोषियों के खिलाफ अदालत को पर्याप्त सबूत और गवाह मिले, जिसके आधार पर उनकी सजा को बरकरार रखा गया है।
2019 में CBI कोर्ट ने सुनाई थी सजा
इस मामले में इससे पहले 17 जनवरी 2019 को पंचकूला स्थित स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने Ram Rahim समेत सभी आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
सीबीआई कोर्ट के फैसले के बाद राम रहीम और अन्य दोषियों ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद अब हाईकोर्ट ने इस मामले में अंतिम निर्णय सुनाया है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि राम रहीम को साजिशकर्ता साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, जबकि अन्य आरोपियों की भूमिका सबूतों और गवाहों के आधार पर स्पष्ट होती है।
अन्य मामलों में भी घिरे हैं Ram Rahim
हालांकि इस मामले में बरी होने के बावजूद Ram Rahim फिलहाल जेल से बाहर नहीं आ पाएंगे। उन्हें पहले से ही साध्वियों के यौन शोषण के मामले में दोषी ठहराया जा चुका है और वह 10 साल की सजा काट रहे हैं।
इसके अलावा डेरा मैनेजर रणजीत सिंह हत्याकांड में भी पहले हाईकोर्ट ने उन्हें बरी किया था, लेकिन इस फैसले को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी हुई है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि छत्रपति हत्याकांड में हाईकोर्ट के इस फैसले को भी उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
पीड़ित परिवार ने जताई नाराजगी
हाईकोर्ट के फैसले के बाद पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति ने निराशा जाहिर की है। उन्होंने कहा कि सीबीआई ने अदालत में मजबूत तरीके से अपना पक्ष रखा और सभी जरूरी सबूत पेश किए थे।
अंशुल ने कहा कि Ram Rahim को बरी किया जाना गलत है और परिवार अब इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि उनके पिता ने सच को सामने लाने के लिए अपनी जान गंवाई थी और न्याय की लड़ाई जारी रहेगी।
हाईकोर्ट ने सबूतों को बताया अपर्याप्त
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष और सीबीआई दोनों ने अपने-अपने तर्क अदालत के सामने रखे। बचाव पक्ष के वकील बसंत राय ने अदालत में दलील दी कि मामले में कई सबूतों के साथ छेड़छाड़ की आशंका है।
उन्होंने कहा कि पत्रकार को जो गोली लगी थी, वह ‘सॉफ्ट लेड’ से बनी बताई गई थी, जो आमतौर पर स्नाइपर या सैन्य उपकरणों में इस्तेमाल होती है। लेकिन घटना के 20 से अधिक साल बीत जाने के कारण गोली पर मौजूद निशान और पहचान चिह्न स्पष्ट नहीं हैं।
वकील ने यह भी सवाल उठाया कि जिस डिब्बे में गोली रखी गई थी, उस पर एम्स की सील लगी थी और वह अदालत में भी सीलबंद ही पेश किया गया। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि फॉरेंसिक जांच के दौरान डिब्बा कब और कैसे खोला गया।
हाईकोर्ट ने भी सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि गोलियों पर स्पष्ट निशान दिखाई नहीं दे रहे हैं, जिससे जांच के कुछ पहलुओं पर सवाल खड़े होते हैं।
कौन थे पत्रकार रामचंद्र छत्रपति?
रामचंद्र छत्रपति हरियाणा के सिरसा जिले के रहने वाले थे। उन्होंने पहले वकालत की पढ़ाई की, लेकिन बाद में पत्रकारिता को अपना पेशा बना लिया। वर्ष 2000 में उन्होंने सिरसा से अपना अखबार ‘इवनिंग टाइम’ शुरू किया था।
साल 2002 में उन्हें एक गुमनाम चिट्ठी मिली, जिसमें डेरा सच्चा सौदा में साध्वियों के साथ कथित यौन शोषण का आरोप लगाया गया था। छत्रपति ने 30 मई 2002 को इस चिट्ठी को अपने अखबार में प्रकाशित कर दिया।
इस खुलासे के बाद उन्हें लगातार धमकियां मिलने लगीं। परिवार के अनुसार, उन्हें कई महीनों तक डराने-धमकाने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने अपनी रिपोर्टिंग जारी रखी।
2002 में हुई थी हत्या
19 अक्टूबर 2002 की रात रामचंद्र छत्रपति अपने घर के बाहर मौजूद थे, तभी अज्ञात हमलावरों ने उन पर गोली चला दी। उन्हें पांच गोलियां मारी गईं, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए।
उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 21 अक्टूबर 2002 को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। इस घटना के बाद पूरे इलाके में भारी आक्रोश फैल गया था।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी। लंबी जांच और सुनवाई के बाद सीबीआई कोर्ट ने 2019 में सभी आरोपियों को दोषी करार दिया था।
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