Doomscrolling vs Bloomscrolling: आखिर क्या है ये नया सोशल मीडिया ट्रेंड? Gen Z में तेजी से हो रहा पॉपुलर
Doomscrolling vs Bloomscrolling: आज के दौर में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। सुबह उठते ही मोबाइल चेक करना और रात को सोने से पहले तक सोशल मीडिया स्क्रॉल करना अब आम आदत बन गई है। खासकर Gen Z यानी नई पीढ़ी में सोशल मीडिया का इस्तेमाल काफी ज्यादा देखने को मिलता है।
इसी डिजिटल लाइफस्टाइल के बीच दो नए शब्द तेजी से चर्चा में आ रहे हैं — डूमस्क्रॉलिंग (Doomscrolling) और ब्लूमस्क्रोलिंग (Bloomscrolling)। पहली नजर में ये दोनों शब्द एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन इनके मतलब और असर बिल्कुल अलग हैं।
जहां एक आदत मानसिक तनाव बढ़ा सकती है, वहीं दूसरी आदत मूड को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर इन दोनों शब्दों का मतलब क्या है और क्यों ये आजकल इतनी चर्चा में हैं।
Doomscrolling क्या है?
Doomscrolling का मतलब है सोशल मीडिया या इंटरनेट पर लगातार ऐसी खबरें या पोस्ट देखते रहना जो नेगेटिव, डरावनी या परेशान करने वाली हों।
उदाहरण के लिए –
क्राइम न्यूज, एक्सीडेंट की खबरें, विवाद, राजनीतिक तनाव, या ऐसी पोस्ट जो चिंता और डर पैदा करती हों।
अक्सर लोग सिर्फ अपडेट रहने के लिए सोशल मीडिया खोलते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वे लगातार ऐसी ही खबरें देखते रहते हैं। देखते-देखते घंटों बीत जाते हैं और व्यक्ति को पता भी नहीं चलता कि उसने कितना समय मोबाइल पर बिताया है।
मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक लंबे समय तक डूमस्क्रॉलिंग करने से दिमाग पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इससे तनाव, चिंता, ओवरथिंकिंग और मानसिक थकान बढ़ सकती है।
Bloomscrolling क्या है?
Bloomscrolling को Doomscrolling का पॉजिटिव वर्जन माना जाता है। इसमें लोग जानबूझकर ऐसा कंटेंट देखते हैं जो उन्हें अच्छा महसूस कराए और मन को हल्का बनाए।
जैसे –
मोटिवेशनल वीडियो
नेचर या ट्रैवल क्लिप
क्यूट पेट्स के वीडियो
इंस्पायरिंग स्टोरी
पॉजिटिव न्यूज
ऐसे कंटेंट देखने से दिमाग को रिलैक्स महसूस होता है और मूड बेहतर हो सकता है। कई रिसर्च में यह भी बताया गया है कि पॉजिटिव कंटेंट देखने से दिमाग में “फील-गुड केमिकल” सक्रिय होते हैं, जिससे व्यक्ति को अच्छा महसूस होता है।
Gen Z में क्यों बढ़ रहा है यह ट्रेंड?
Gen Z Social Media Trends के संदर्भ में देखा जाए तो Gen Z वह पीढ़ी है जो स्मार्टफोन और इंटरनेट के साथ ही बड़ी हुई है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब शॉर्ट्स और रील्स जैसी चीजें उनके रोजमर्रा के जीवन का अहम हिस्सा बन चुकी हैं।
लगातार आने वाले नोटिफिकेशन और छोटे-छोटे वीडियो की वजह से लोग अनजाने में घंटों तक फोन इस्तेमाल करते रहते हैं।
इसी कारण अब कई युवा अपने सोशल मीडिया फीड को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। वे ऐसे अकाउंट फॉलो कर रहे हैं जो मोटिवेशन, फिटनेस, हेल्थ, मेडिटेशन और पॉजिटिव लाइफस्टाइल से जुड़े हों।
इससे उनका स्क्रीन टाइम पूरी तरह खत्म तो नहीं होता, लेकिन देखने वाला कंटेंट थोड़ा ज्यादा हेल्दी और सकारात्मक हो जाता है।
सोशल मीडिया और मेंटल हेल्थ
मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि सोशल मीडिया खुद समस्या नहीं है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि हम उसे किस तरह इस्तेमाल करते हैं।
अगर कोई व्यक्ति लगातार नेगेटिव खबरों और विवादों में उलझा रहता है, तो उसका असर धीरे-धीरे उसके मूड और सोच पर पड़ने लगता है।
वहीं अगर सोशल मीडिया पर पॉजिटिव और प्रेरणादायक कंटेंट देखा जाए, तो यह सीखने और प्रेरणा लेने का अच्छा माध्यम भी बन सकता है।
कैसे रखें डिजिटल लाइफ को बैलेंस?
आज के समय में पूरी तरह सोशल मीडिया से दूर रहना आसान नहीं है। लेकिन कुछ छोटे-छोटे बदलाव करके हम अपनी डिजिटल लाइफ को बेहतर बना सकते हैं।
जैसे –
स्क्रीन टाइम सीमित रखें
नेगेटिव कंटेंट वाले अकाउंट कम देखें
पॉजिटिव और प्रेरणादायक पेज फॉलो करें
सोशल मीडिया से बीच-बीच में ब्रेक लें
इन छोटी-छोटी आदतों से मानसिक तनाव कम हो सकता है और सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी ज्यादा संतुलित तरीके से किया जा सकता है।
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