खेरी नागियां गांव के रहने वाले 43 वर्षीय गुरजीत सिंह ने 18 महीने और 12 दिन तक मोबाइल टावर पर डटे रहने के बाद अब जमीन पर वापसी की है।
Gurjit Singh tower protest: पंजाब के पटियाला जिले के समाना क्षेत्र से एक बेहद अनोखी और चर्चा में रहने वाली घटना का अंत आखिरकार हो गया। खेरी नागियां गांव के रहने वाले 43 वर्षीय गुरजीत सिंह ने 18 महीने और 12 दिन तक मोबाइल टावर पर डटे रहने के बाद अब जमीन पर वापसी की है। शुक्रवार, 24 अप्रैल की सुबह करीब 7:45 बजे प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों की संयुक्त टीम ने उन्हें सुरक्षित नीचे उतारा।
नीचे उतरने के बाद गुरजीत सिंह के पहले शब्द थे—“मैं 18 महीने और 12 दिन बाद सुरक्षित रूप से धरती पर लौट आया हूं।” उनकी यह लंबी लड़ाई ‘बेअदबी की घटनाओं’ के खिलाफ सख्त कानून बनाने की मांग को लेकर थी, जो अब पूरा हो चुका है।
क्या थी गुरजीत सिंह की मांग?
गुरजीत सिंह 12 अक्टूबर 2024 को समाना शहर के बीच स्थित एक मोबाइल टावर पर चढ़ गए थे। उनका मुख्य उद्देश्य धार्मिक ग्रंथों के अपमान (बेअदबी) के मामलों में सख्त सजा का प्रावधान सुनिश्चित करना था।
लगातार चले विरोध और जनसमर्थन के बाद पंजाब विधानसभा ने 13 अप्रैल 2026 को ‘जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026’ पारित किया। 17 अप्रैल को राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून लागू हो गया। हालांकि, इस कानून को लेकर विवाद भी शुरू हो गया है और इसे पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है।
300 फीट ऊंचाई पर संघर्ष की कहानी
गुरजीत सिंह ने लगभग 300 फीट ऊंचे टावर पर अपना ठिकाना बनाया था। शुरुआत में उन्होंने टावर पर चढ़कर स्थिति का जायजा लिया और फिर धीरे-धीरे वहां एक अस्थायी टेंट लगाकर रहने की व्यवस्था कर ली।
एक पूर्व सैनिक होने के कारण उन्होंने सीमित संसाधनों के साथ खुद को ढाल लिया। उन्होंने बताया कि शुरुआती दिनों में उनके पास सिर्फ पानी की बोतलें और थोड़ा नाश्ता था, जो जल्दी खत्म हो गया। इसके बाद प्रशासन और उनके परिचितों ने उन्हें जरूरी सामान पहुंचाना शुरू किया।
उनकी दिनचर्या भी बेहद अलग थी—वे रातभर जागते और सुबह सूर्योदय के बाद सोते थे। इसका कारण सुरक्षा को लेकर उनका डर था।
मौसम और हालात से जंग
टावर पर बिताए गए ये 18 महीने गुरजीत सिंह के लिए आसान नहीं थे। उन्हें भीषण गर्मी, तेज हवाओं, बारिश और कड़ाके की ठंड का सामना करना पड़ा।
उन्होंने बताया कि तेज हवाओं के दौरान टावर हिलता था, जिससे डर और अस्थिरता बनी रहती थी। सर्दियों में घना कोहरा और ठंड बेहद परेशान करती थी, जबकि बारिश के दिनों में कपड़े लगातार गीले रहते थे।
खाने-पीने की स्थिति भी चुनौतीपूर्ण थी। वे दिन में सिर्फ एक बार खाना खाते थे और ज्यादातर तरल पदार्थों पर निर्भर रहते थे। लंबे समय तक इस स्थिति में रहने से उनके पैरों में सूजन आ गई और स्वास्थ्य पर भी असर पड़ा।
हर दिन टावर पर मदद कैसे पहुँचती थी?
गुरजीत सिंह तक रोजाना जरूरी सामान पहुंचाने का काम गुरजंत सिंह नामक युवक करता था, जो टावर इंस्टॉलेशन का काम करता है।
गुरजंत हर दिन करीब 40 मिनट में 300 फीट की ऊंचाई तक चढ़कर खाना, पानी, दवाइयां और अन्य जरूरी चीजें पहुंचाता था। वह हर 100 फीट पर रुककर आराम करता और फिर आगे बढ़ता था।
उसने बताया कि मौसम के अनुसार टावर के पाइप कभी बहुत गर्म तो कभी बेहद ठंडे हो जाते थे, जिससे उसके हाथों की त्वचा तक छिल गई।
प्रशासन और सेना का संयुक्त ऑपरेशन
गुरजीत सिंह को नीचे उतारने के लिए पटियाला प्रशासन, नागरिक सुरक्षा और भारतीय सेना ने संयुक्त अभियान चलाया।
दमकल विभाग के कर्मी कृष्ण कुमार ने बताया कि इस ऑपरेशन के लिए कई दिनों तक अभ्यास किया गया था। आखिरकार टीम ने उन्हें सुरक्षित नीचे उतारा।
नीचे आने के बाद उन्हें तुरंत मेडिकल जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया और बाद में पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया।
आंदोलन बना जनआंदोलन
गुरजीत सिंह का यह विरोध धीरे-धीरे एक बड़े आंदोलन में बदल गया। समाना के बाबा बंदा सिंह बहादुर चौक पर ‘धर्म युद्ध मोर्चा’ के तहत धरना शुरू हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, किसान नेताओं और आम लोगों ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। यह स्थान संगरूर और पटियाला को हरियाणा से जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग है, जिससे आंदोलन को और ज्यादा ध्यान मिला।
परिवार और भावनात्मक जुड़ाव
गुरजीत सिंह के परिवार में उनकी पत्नी और एक बेटा है। उन्होंने अपनी मां को याद करते हुए कहा कि वह उनके सबसे करीब थीं और वह उनसे मन ही मन बातचीत करते रहते थे।
इतनी कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनका मनोबल बना रहा और उन्होंने अपनी मांग पूरी होने तक हार नहीं मानी।
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