Oil Crisis झंझट खतम गैस तेल की - अब जलेंगे चूल्हे - देश नहीं रुकेगा
होर्मुज जलडमरूमध्य संकट को ध्यान में रख कर भारत नई ऊर्जा नीति तैयार कर रहा है – अब संकट का वैकल्पिक समाधान उपयोग में लाया जायेगा
होर्मुज जलडमरूमध्य, जिसे वैश्विक ऊर्जा कॉरिडोर कहा जाता है, दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का सबसे अहम समुद्री रास्ता है। भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आता है। लेकिन ईरान और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने इस कॉरिडोर की स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से कई देशों में तेल और गैस की कमी हो गई है। भारत ने इस संकट से सबक लेते हुए अपनी ऊर्जा नीति में बड़े बदलाव करने का फैसला किया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व
होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग एक तिहाई तेल गुजरता है।
भारत की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आता है।
ईरान युद्ध और अमेरिका-इजरायल हमले के बाद जहाजों की आवाजाही बाधित हुई।
LPG और तेल की कमी से कई देशों को आपातकालीन कदम उठाने पड़े।
भारत की ऊर्जा निर्भरता
भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 33% आयात करता है।
अरब देशों से तेल और गैस दोनों का आयात होता है।
गाड़ियां, उद्योग और घरेलू चूल्हे इन आयातित ईंधनों पर निर्भर हैं।
खाड़ी देशों में संकट का सीधा असर भारत पर पड़ता है।
संकट से मिली सीख
ईरान युद्ध ने दिखा दिया कि फॉसिल फ्यूल आधारित विकास मॉडल कितना अस्थिर है। भारत ने तय किया है कि आने वाले 9-10 सालों में अपनी कुल बिजली उत्पादन क्षमता का 60% हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधनों से हासिल करेगा। इससे तेल और गैस पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी।
जलवायु प्रतिबद्धताएं और नए लक्ष्य
भारत ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क (UNFCCC) के तहत 2031-2035 की अवधि के लिए नए राष्ट्रीय योगदान (NDC) को मंजूरी दी है।
2005 के स्तर के मुकाबले उत्सर्जन तीव्रता में 47% कमी का लक्ष्य।
2035 तक कुल बिजली क्षमता का 60% हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधनों से।
यह कदम पेरिस समझौते के तहत भारत की जिम्मेदारियों का हिस्सा है।
पुराने लक्ष्य और उपलब्धियां
भारत ने 2015 में तय किए गए लक्ष्य (33-35% उत्सर्जन कमी और 40% गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता) समय से पहले ही हासिल कर लिए।
इसी आधार पर अब और कड़े लक्ष्य तय किए गए हैं।
यह कदम ‘विकसित भारत 2047’ की परिकल्पना को भी मजबूत करता है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण कई देश अपने जलवायु लक्ष्यों से पीछे हट रहे हैं।
भारत का कदम वैश्विक मंच पर सकारात्मक संकेत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु महत्वाकांक्षा के बीच संतुलन साधा है।
संभावित उपलब्धियां
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार 2035-36 तक भारत की गैर-जीवाश्म क्षमता 70% तक पहुंच सकती है।
सरकार ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता के तौर पर 60% का लक्ष्य रखा है।
इससे लक्ष्य यथार्थवादी और विश्वसनीय बनेगा।
नीतिगत कदम
भारत इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कई नीतियों पर काम कर रहा है:
ग्रीन हाइड्रोजन मिशन।
बैटरी स्टोरेज और स्वच्छ औद्योगिक प्रक्रियाएं।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर।
International Solar Alliance जैसे वैश्विक सहयोग मंच।
राष्ट्रीय जलवायु कार्य योजना (NAPCC)।
तकनीकी निवेश
कार्बन कैप्चर तकनीक।
जलवायु-लचीला बुनियादी ढांचा।
तटीय सुरक्षा और ग्लेशियर निगरानी।
हीट एक्शन प्लान और आपदा लचीलापन।
नागरिकों की भूमिका
भारत ने Lifestyle for Environment (LiFE) पहल शुरू की है। इसका उद्देश्य आम नागरिकों को जलवायु कार्रवाई में शामिल करना है। रोजमर्रा की जीवनशैली में पर्यावरण अनुकूल बदलाव लाने पर जोर दिया जा रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य संकट ने भारत को ऊर्जा नीति में बड़े बदलाव करने के लिए प्रेरित किया है। आने वाले वर्षों में भारत तेल और गैस पर निर्भरता कम कर नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर देगा। इससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी बल्कि जलवायु लक्ष्यों को भी हासिल किया जा सकेगा। भारत का यह कदम वैश्विक स्तर पर एक मिसाल बनेगा।






