11 मार्च को गलती से भी घर में चूल्हा न जलाएं, जानें Sheetala Saptami 2026 के नियम
Sheetala Saptami 2026: हिंदू धर्म में कई ऐसे पर्व हैं जो केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होते, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और परिवार की खुशहाली से भी जुड़े होते हैं। उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण पर्व है शीतला सप्तमी। यह दिन माता शीतला को समर्पित होता है, जिन्हें रोगों से रक्षा करने वाली और परिवार को स्वस्थ रखने वाली देवी माना जाता है।
मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमों के साथ माता शीतला की पूजा करने से चेचक, खसरा, त्वचा रोग और अन्य संक्रमणों से बचाव होता है। यही कारण है कि उत्तर भारत के कई राज्यों में इस पर्व को बड़े विश्वास और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। विशेष रूप से महिलाएं इस दिन व्रत रखकर अपने परिवार और बच्चों के स्वास्थ्य की कामना करती हैं।
शीतला सप्तमी 2026 कब है?
साल 2026 में शीतला सप्तमी 10 मार्च 2026, मंगलवार को मनाई जाएगी।
तिथि और मुहूर्त इस प्रकार हैं –
- सप्तमी तिथि प्रारंभ – 9 मार्च 2026 रात 11:27 बजे
- सप्तमी तिथि समाप्त – 11 मार्च 2026 सुबह 01:54 बजे
- पूजा का शुभ समय – सुबह 06:04 बजे से शाम 05:56 बजे तक
इसके अगले दिन 11 मार्च 2026 को शीतला अष्टमी मनाई जाएगी, जिसे कई जगहों पर बसोड़ा (Basoda) भी कहा जाता है।
क्यों नहीं जलाया जाता चूल्हा?
शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी का सबसे खास नियम यह है कि इस दिन घर में चूल्हा या गैस नहीं जलाया जाता। यानी ताज़ा भोजन नहीं बनाया जाता।
इस दिन माता को ठंडा और एक दिन पहले बना हुआ भोजन अर्पित किया जाता है। इसी वजह से इस पर्व को कई जगहों पर “बसोड़ा” भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है बासी भोजन का पर्व।
धार्मिक मान्यता के अनुसार माता शीतला को ठंडा भोजन प्रिय माना जाता है। इसलिए इस दिन गर्म खाना बनाना शुभ नहीं माना जाता। पहले से तैयार भोजन माता को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
Basoda Puja 2026
Sheetala Mata Vrat Rules बहुत ही सरल और पारंपरिक तरीके से की जाती है।
सबसे पहले शीतला सप्तमी से एक दिन पहले यानी शाम को भोजन बना लिया जाता है। इसमें आमतौर पर पूरी, मीठे चावल, गुड़, दही, बाजरे की रोटी और कुछ मीठे पकवान शामिल होते हैं।
सप्तमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान किया जाता है और साफ कपड़े पहनकर माता शीतला की पूजा की जाती है।
पूजा के दौरान माता को ठंडे जल का अर्घ्य दिया जाता है और नीम की पत्तियों से उनका अभिषेक किया जाता है। नीम को इस पूजा में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसमें औषधीय गुण होते हैं।
इसके बाद माता की कथा सुनी जाती है, आरती की जाती है और परिवार की सुख-समृद्धि तथा स्वास्थ्य की कामना की जाती है। कई लोग इस दिन गरीबों को भोजन या वस्त्र दान भी करते हैं।
शीतला माता की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार माता शीतला पृथ्वी पर यह देखने आईं कि लोग उनकी पूजा करते हैं या नहीं। उन्होंने एक वृद्ध महिला का रूप धारण किया और एक गाँव में पहुँचीं।
गाँव में एक परिवार ने उन्हें पहचान लिया और बड़े प्रेम से ठंडा भोजन परोसा। माता उस परिवार की श्रद्धा से प्रसन्न हुईं और उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया।
लेकिन उसी गाँव के कुछ लोगों ने उनका अपमान किया और गर्म भोजन बनाया। कहा जाता है कि इसके बाद उस गाँव में बीमारी फैल गई। जब लोगों को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने माता से क्षमा मांगी और ठंडा भोजन अर्पित करके उनकी पूजा की।
तभी से यह परंपरा शुरू हुई कि शीतला सप्तमी और अष्टमी के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता।
स्वास्थ्य से जुड़ा संदेश
इस पर्व के पीछे केवल धार्मिक मान्यता ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ा एक संदेश भी छिपा हुआ है। यह समय मौसम बदलने का होता है, जब संक्रमण और बीमारियां फैलने का खतरा अधिक रहता है।
ऐसे में स्वच्छता, सादा भोजन और नीम जैसे औषधीय तत्वों का उपयोग शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करता है। इसलिए शीतला सप्तमी को केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं बल्कि स्वास्थ्य और स्वच्छता का प्रतीक भी माना जाता है।
कहाँ प्रसिद्ध है यह पर्व?
शीतला सप्तमी और अष्टमी का पर्व खासतौर पर राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में बहुत लोकप्रिय है। गुरुग्राम का शीतला माता मंदिर इस पूजा के लिए बेहद प्रसिद्ध माना जाता है, जहां हर साल हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
कुल मिलाकर शीतला सप्तमी केवल एक त्योहार नहीं बल्कि आस्था, स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली से जुड़ी परंपरा है। माता शीतला की कृपा से भक्तों को रोगों से मुक्ति और घर में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलने की मान्यता है।
यह भी पढ़े







