
Munshi Premchand Birth Anniversary 2025: कलम का सिपाही, मुंशी प्रेमचंद की प्रेरणादायक कहानी
Munshi Premchand Birth Anniversary 2025: मुंशी प्रेमचंद, जिनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था, हिंदी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्यकारों में गिने जाते हैं। 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गांव में जन्मे प्रेमचंद ने अपने साहित्य के माध्यम से समाज के यथार्थ को इतनी सजीवता से चित्रित किया कि उन्हें “कलम का सिपाही” और “आदर्श यथार्थवाद” का प्रवर्तक कहा गया।
प्रारंभिक जीवन
प्रेमचंद का बचपन संघर्षों से भरा रहा। सात वर्ष की उम्र में मां का निधन और सोलह साल की उम्र में पिता का देहांत हो गया। विवाह कम उम्र में हो गया, लेकिन वह संबंध सफल नहीं रहा। बाद में उन्होंने बाल-विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया, जिनसे उन्हें तीन संतानें हुईं। प्रारंभिक शिक्षा फारसी में हुई और 1919 में उन्होंने बी.ए. की डिग्री प्राप्त की।
नौकरी से लेखन तक
प्रेमचंद ने अपने जीवन की शुरुआत शिक्षक के रूप में की और बाद में शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर बन गए। 1921 में महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और साहित्य को ही अपने जीवन का साधन बना लिया।
साहित्यिक योगदान
प्रेमचंद का साहित्यिक जीवन 1901 से शुरू हुआ। आरंभ में वह उर्दू में ‘नवाब राय’ नाम से लिखते थे, लेकिन ब्रिटिश सरकार द्वारा उनकी देशभक्तिपूर्ण कहानियों को प्रतिबंधित किए जाने के बाद उन्होंने ‘प्रेमचंद’ नाम अपनाया।
उन्होंने लगभग 300 कहानियाँ और 15 से अधिक उपन्यास लिखे। उनकी कहानियों में ‘कफन’, ‘पूस की रात’, ‘ईदगाह’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘बड़े घर की बेटी’, ‘दो बैलों की कथा’ जैसी अमर रचनाएं हैं।
प्रेमचंद के प्रमुख उपन्यासों में ‘सेवासदन’, ‘गबन’, ‘रंगभूमि’, ‘निर्मला’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’ प्रमुख हैं। ‘गोदान’ को उनका श्रेष्ठतम उपन्यास माना जाता है, जिसमें किसान जीवन की त्रासदी और सामाजिक अन्याय का मार्मिक चित्रण है।
विचारधारा और विशेषताएँ
प्रेमचंद का साहित्य आदर्श और यथार्थ का अद्भुत संगम है। उन्होंने जातिवाद, छुआछूत, स्त्री-शोषण, दहेज, बेगारी, धार्मिक पाखंड, गरीबी और अन्याय को अपनी रचनाओं में उजागर किया। उनके साहित्य में शोषित, पीड़ित, गरीब और मेहनतकश वर्ग की पीड़ा मुखर होती है।
वे आरंभ में नैतिक आदर्शों पर केंद्रित थे, लेकिन धीरे-धीरे उनका लेखन सामाजिक यथार्थ की ओर झुकता गया। उनकी अंतिम रचनाएं जैसे ‘महाजनी सभ्यता’ और ‘कफन’, समाज की विडंबनाओं का नग्न चित्र प्रस्तुत करती हैं।
प्रेमचंद और पत्र-पत्रिकाएं
प्रेमचंद ने ‘हंस’ और ‘जागरण’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया और ‘सरस्वती प्रेस’ भी चलाया। हालांकि यह प्रेस आर्थिक रूप से सफल नहीं रहा, लेकिन प्रेमचंद ने इसे एक मिशन के रूप में चलाया।
फिल्मों और नाटकों से जुड़ाव
प्रेमचंद कुछ समय के लिए मुंबई भी गए और फिल्म पटकथाएं लिखीं। उन्होंने ‘मजदूर’ फिल्म की कहानी लिखी, लेकिन फिल्मी दुनिया उन्हें रास नहीं आई और वे बनारस लौट आए।
उन्होंने कुछ नाटक भी लिखे, जैसे ‘कर्बला’, ‘प्रेम की वेदी’, लेकिन वे उतने लोकप्रिय नहीं हुए जितनी उनकी कहानियाँ और उपन्यास।
मरणोपरांत लोकप्रियता और विरासत
1936 में प्रेमचंद का निधन हुआ। उनके देहांत के बाद भी उनके साहित्य की लोकप्रियता बढ़ती रही। उनकी कहानियों पर कई फिल्में और टीवी धारावाहिक बने। सत्यजित राय ने उनकी कहानियों पर ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और ‘सद्गति’ जैसी फिल्में बनाईं।
प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय ने उनकी जीवनी ‘कलम का सिपाही’ लिखी, जो बेहद प्रसिद्ध हुई। प्रेमचंद की रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी उनके समय में थीं। वे केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि समाज के सजग प्रहरी थे।
मुंशी प्रेमचंद भारतीय साहित्य के वो स्तंभ हैं जिन्होंने अपनी लेखनी से समाज को आईना दिखाया। उन्होंने साहित्य को महज मनोरंजन का साधन न मानकर उसे सामाजिक बदलाव का हथियार बनाया। प्रेमचंद का साहित्य हर पीढ़ी के लिए एक सीख, एक मार्गदर्शन है। उनका यथार्थवादी दृष्टिकोण, मानवीय संवेदना और सामाजिक सरोकार उन्हें हिंदी साहित्य में अमर बनाते हैं।
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