एक लीटर डीजल में ट्रेन कितनी दूरी तय कर पाती है?
भारत की जीवनरेखा कही जाने वाली Indian Railways सिर्फ देश की नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी रेल व्यवस्थाओं में से एक है। रोज़ाना लाखों यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचाने वाली यह प्रणाली अपने विशाल नेटवर्क, तेज़ी से हो रहे आधुनिकीकरण और रिकॉर्ड स्तर के निवेश के कारण वैश्विक स्तर पर चर्चा में है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इतनी बड़ी ट्रेनें आखिर कितना ईंधन खर्च करती हैं? एक लीटर डीजल में ट्रेन कितनी दूरी तय कर पाती है?
आज हम आपको भारतीय ट्रेनों के माइलेज और हालिया उपलब्धियों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।
हाल के वर्षों में बने बड़े रिकॉर्ड
पिछले कुछ वर्षों में Indian Railways ने इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीक के क्षेत्र में कई बड़े कदम उठाए हैं।
- लगभग 2.93 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड पूंजीगत व्यय
- 35,000 किलोमीटर नई पटरियों का निर्माण
- 47,000 किलोमीटर से अधिक ट्रैक का विद्युतीकरण
- ब्रॉड गेज नेटवर्क का 99 प्रतिशत से अधिक विद्युतीकरण
इसके साथ ही नई पीढ़ी की ट्रेनों जैसे वंदे भारत एक्सप्रेस, अमृत भारत एक्सप्रेस और नमो भारत को शुरू किया गया है।
रेल मंत्रालय ने सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर विकसित करने की भी घोषणा की है, जिनमें मुंबई–पुणे, दिल्ली–वाराणसी और वाराणसी–सिलीगुड़ी जैसे रूट शामिल हैं। इन परियोजनाओं का उद्देश्य देश के प्रमुख शहरों को तेज़ और सुरक्षित रेल सेवा से जोड़ना है।
Indian Railways में ट्रेन का माइलेज कितना होता है?
सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट के मुताबिक, भारतीय रेलवे के डीजल इंजन औसतन एक लीटर ईंधन में 4 से 5 किलोमीटर की दूरी तय कर सकते हैं। हालांकि, यह आंकड़ा ट्रेन के वजन, डिब्बों की संख्या, ट्रैक की स्थिति और गति पर निर्भर करता है।
रेल विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रेन का माइलेज कार की तरह नहीं मापा जाता, बल्कि प्रति किलोमीटर ईंधन खपत के आधार पर देखा जाता है।
पैसेंजर, एक्सप्रेस और सुपरफास्ट ट्रेनों की खपत
रिपोर्ट्स के अनुसार:
- 12 डिब्बों वाली एक यात्री ट्रेन को 1 किलोमीटर चलने में लगभग 6 लीटर डीजल की जरूरत होती है।
- 24 डिब्बों वाली सुपरफास्ट ट्रेन भी औसतन 6 लीटर प्रति किलोमीटर ईंधन खर्च करती है।
- 12 डिब्बों वाली एक्सप्रेस ट्रेन को लगभग 4.5 लीटर प्रति किलोमीटर डीजल की आवश्यकता होती है।
डिब्बों की संख्या इंजन पर भार बढ़ाती है, जिससे ईंधन खपत प्रभावित होती है। हालांकि, सिर्फ वजन ही नहीं बल्कि स्टॉपेज की संख्या भी माइलेज तय करती है।
बार-बार रुकने से क्यों बढ़ती है खपत?
पैसेंजर ट्रेनें अक्सर छोटे-छोटे स्टेशनों पर रुकती हैं। बार-बार ब्रेक लगाने और फिर दोबारा गति पकड़ने की प्रक्रिया में इंजन को अधिक ऊर्जा लगती है। इससे एक्सीलरेटर और ब्रेक का इस्तेमाल बढ़ जाता है और डीजल की खपत ज्यादा होती है।
इसके विपरीत, एक्सप्रेस और सुपरफास्ट ट्रेनें कम स्टॉप के कारण लंबे समय तक समान गति बनाए रखती हैं, जिससे उनका माइलेज बेहतर होता है।
यही कारण है कि कभी-कभी अधिक डिब्बों वाली सुपरफास्ट ट्रेन भी पैसेंजर ट्रेन की तुलना में बेहतर ईंधन दक्षता दिखा सकती है।
तेजी से बढ़ रहा है विद्युतीकरण
ध्यान देने वाली बात यह है कि Indian Railways अब तेजी से डीजल से इलेक्ट्रिक इंजन की ओर बढ़ रही है। 99 प्रतिशत से अधिक ब्रॉड गेज नेटवर्क के विद्युतीकरण के बाद इलेक्ट्रिक ट्रेनों की संख्या लगातार बढ़ी है।
इलेक्ट्रिक इंजन डीजल इंजनों की तुलना में अधिक ऊर्जा दक्ष माने जाते हैं और पर्यावरण के लिए भी बेहतर हैं। इससे कार्बन उत्सर्जन कम होता है और परिचालन लागत में भी कमी आती है।
सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में रेलवे को ‘नेट जीरो कार्बन एमिशन’ की दिशा में ले जाना है।
क्यों जरूरी है माइलेज समझना?
ट्रेन का माइलेज केवल ईंधन खर्च का मामला नहीं है, बल्कि यह रेलवे की आर्थिक सेहत और पर्यावरणीय प्रभाव से भी जुड़ा है। बेहतर ईंधन दक्षता का मतलब है कम लागत, कम प्रदूषण और अधिक टिकाऊ परिवहन प्रणाली।
भारतीय रेल की विशालता को देखते हुए, ईंधन में थोड़ी-सी बचत भी सालाना करोड़ों रुपये की बचत में बदल सकती है।
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