सुनवाई का केंद्र बिंदु सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर 2018 के ऐतिहासिक फैसले की समीक्षा है
सुनवाई का केंद्र बिंदु सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर 2018 के ऐतिहासिक फैसले की समीक्षा है
Sabarimala case Supreme Court: देश में धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और लैंगिक समानता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर आज से Supreme Court of India की 9 जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है। इस सुनवाई का केंद्र बिंदु सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर 2018 के ऐतिहासिक फैसले की समीक्षा है, लेकिन इसके साथ ही कई अन्य धार्मिक प्रथाओं पर भी अदालत की नजर है।
यह मामला सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में अलग-अलग धर्मों में महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन तय करने का एक बड़ा अवसर माना जा रहा है।
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Toggleसबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर वर्षों से प्रतिबंध रहा है। मंदिर में भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माना जाता है, जिसके आधार पर यह परंपरा लागू की गई थी।
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी थी। इस फैसले के बाद देशभर में बहस और विरोध-प्रदर्शन भी हुए।
अब इस फैसले के खिलाफ दाखिल 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है, जिसमें यह तय किया जाएगा कि पुराना आदेश बरकरार रहेगा या उसमें बदलाव किया जाएगा।
केंद्र सरकार ने अदालत में अपने लिखित जवाब में कहा है कि सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध का संबंध उनकी ‘शुद्धता’ से नहीं, बल्कि धार्मिक परंपराओं से है।
सरकार का तर्क है कि यदि महिलाओं को प्रवेश दिया जाता है, तो मंदिर की पारंपरिक पूजा-पद्धति में बदलाव आ सकता है, जिससे संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक विविधता प्रभावित हो सकती है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट केवल सबरीमाला ही नहीं, बल्कि कई अन्य धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर भी विचार करेगा। संविधान पीठ के सामने मुख्य रूप से पांच अहम मुद्दे हैं:
1. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश
क्या सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश का अधिकार होना चाहिए, या पारंपरिक प्रतिबंध जारी रहना चाहिए?
2. दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना
क्या यह प्रथा महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? इस पर 2017 से मामला लंबित है।
3. मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश
क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है, या यह उनके अधिकारों का हनन है?
4. पारसी महिलाओं का धार्मिक स्थलों में प्रवेश
क्या दूसरे धर्म में शादी करने वाली पारसी महिला को अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है?
5. धार्मिक प्रथाओं में लैंगिक भेदभाव
क्या धर्म के नाम पर जेंडर के आधार पर भेदभाव को संविधान के तहत वैध माना जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के बाद 2 जनवरी 2019 को दो महिलाओं—बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी—ने पुलिस सुरक्षा के बीच सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया था। यह घटना ऐतिहासिक मानी गई, क्योंकि वे इस परंपरा को तोड़ने वाली पहली महिलाएं बनीं।
हालांकि, इसके बाद राज्य में व्यापक विरोध और तनाव की स्थिति भी देखने को मिली थी।
धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के अधिकारों से जुड़े ये मुद्दे पिछले 20 से अधिक वर्षों से विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट में अब इन पर अंतिम सुनवाई 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक चलेगी।
इस दौरान याचिकाकर्ता और उनके समर्थन में खड़े पक्ष 7 से 9 अप्रैल तक अपनी दलीलें देंगे, जबकि विरोध करने वाले पक्ष 14 से 16 अप्रैल के बीच अपनी बात रखेंगे।
यदि सुप्रीम कोर्ट 2018 के अपने फैसले को बरकरार रखता है, तो इसका असर केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं रहेगा। इससे देशभर में धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश को लेकर एक मजबूत कानूनी मिसाल स्थापित होगी।
वहीं, अगर अदालत अपने फैसले में बदलाव करती है, तो यह धार्मिक परंपराओं को प्राथमिकता देने वाला बड़ा संकेत माना जाएगा।
यह सुनवाई भारतीय समाज में धर्म, परंपरा और समानता के बीच संतुलन तय करने के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है। अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी है, जो आने वाले समय में देश की सामाजिक और कानूनी दिशा तय कर सकता है।

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