पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव अब आम लोगों की जेब तक असर डालने लगा है।
Middle East Crisis: पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव अब आम लोगों की जेब तक असर डालने लगा है। कच्चे तेल और अन्य जरूरी कच्चे माल की कीमतों में तेज उछाल ने कंपनियों की लागत बढ़ा दी है, जिसके चलते आने वाले दिनों में कई जरूरी वस्तुओं के दाम बढ़ सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बोतलबंद पानी, खाद्य तेल, नमक जैसे रोजमर्रा के उत्पादों से लेकर एसी, फ्रिज और मेडिकल सामान तक महंगे हो सकते हैं।
किस इंडस्ट्री पर सबसे बड़ा संकट
इस पूरे संकट का सबसे ज्यादा असर प्लास्टिक उद्योग पर देखने को मिल रहा है, जिसे इस समय सबसे बड़ी मार झेलनी पड़ रही है। बीते एक महीने में प्लास्टिक बनाने वाले कच्चे माल की कीमतों में 50% से 70% तक की भारी वृद्धि दर्ज की गई है।
सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक ग्रैन्यूल एलडीपीई (LDPE) अब 110 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 180 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुका है। इसके अलावा अन्य पॉलीमर और कच्चे माल की कीमतों में भी प्रति टन 30,000 से 70,000 रुपये तक की बढ़ोतरी हुई है।
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर यही हालात बने रहे तो अप्रैल महीने में प्लास्टिक उत्पादों की कीमतें 50-60% तक बढ़ सकती हैं। प्लास्टिक टंकी, कंटेनर और पैकेजिंग सामग्री के दाम 30-40% तक बढ़ने की आशंका है।
रोजगार पर खतरा
ऑल इंडिया प्लास्टिक मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अनुसार, इस सेक्टर से करीब 5 लाख लोग जुड़े हुए हैं। संगठन के अध्यक्ष सुनील शाह ने चेतावनी दी है कि यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो 2 से 3 लाख लोगों की नौकरी पर संकट आ सकता है।
उन्होंने सरकार से मांग की है कि:
- प्लास्टिक उत्पादों पर जीएसटी को 18% से घटाकर 5% किया जाए
- बैंकों द्वारा दी जाने वाली वर्किंग कैपिटल लिमिट को 20% तक बढ़ाया जाए
ताकि उद्योग को राहत मिल सके और उत्पादन जारी रखा जा सके।
एलपीजी संकट से 20 हजार यूनिट बंद
स्थिति को और गंभीर बनाते हुए कॉमर्शियल एलपीजी की भारी कमी भी सामने आई है। गैस की उपलब्धता न होने के कारण देशभर में कई छोटे और मध्यम उद्योगों को अपना उत्पादन बंद करना पड़ा है।
अनुमान है कि:
- करीब 50 हजार प्लास्टिक फैक्ट्रियों पर असर पड़ा है
- लगभग 20 हजार यूनिट्स पूरी तरह बंद हो चुकी हैं
गुजरात के राजकोट, मध्य प्रदेश, रायपुर और हैदराबाद जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में कई प्लांट्स बंद हो चुके हैं। उद्योगपतियों का कहना है कि गैस के बिना उत्पादन संभव नहीं है और ऊंची कीमतों पर भी एलपीजी उपलब्ध नहीं हो पा रही।
रेडी-टू-ईट की मांग बढ़ी
इस संकट का असर अब लोगों की जीवनशैली पर भी दिखने लगा है। शहरों में घरेलू कामगारों की कमी और गैस की किल्लत के कारण लोग अब आसान और जल्दी बनने वाले खाद्य विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।
BigBasket के अधिकारियों के अनुसार, रेडी-टू-ईट उत्पादों की बिक्री सामान्य से करीब 10% अधिक हो गई है। वहीं, इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री में पिछले कुछ दिनों में 10 गुना तक की बढ़ोतरी देखी गई है।
Amazon India ने भी इंस्टेंट नूडल्स, जूस, नट्स और प्रोटीन स्नैक्स की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि की पुष्टि की है। कंपनी ने इसके लिए एक विशेष “रेडी-टू-ईट स्टोर” भी लॉन्च किया है।
सीमेंट इंडस्ट्री भी दबाव में
महंगाई की मार केवल उपभोक्ता वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्माण क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। पेटकोक, कोयला और पैकेजिंग सामग्री की कीमतों में तेजी से वृद्धि ने सीमेंट उद्योग की लागत बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
- उत्पादन लागत में 150 से 200 रुपये प्रति टन तक की बढ़ोतरी हो सकती है
- कंपनियों को कीमतें 4-5% तक बढ़ानी पड़ सकती हैं
हालांकि, बाजार में अधिक आपूर्ति के कारण कंपनियों के लिए कीमत बढ़ाना आसान नहीं है। हाल ही में सीमेंट कंपनियों ने प्रति बोरी 15-20 रुपये तक कीमत बढ़ाई थी, लेकिन मांग कमजोर होने के कारण यह वृद्धि वापस लेनी पड़ी।
आगे क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि अभी स्थिति शुरुआती चरण में है, लेकिन यदि पश्चिम एशिया का तनाव लंबा खिंचता है, तो इसका असर और व्यापक हो सकता है।
- खाद्य और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें और बढ़ सकती हैं
- छोटे उद्योगों पर दबाव बढ़ेगा
- रोजगार पर असर और गहरा हो सकता है
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