लोकसभा के मौजूदा सत्र में 13 मार्च को पेश किए गए ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 ने देशभर में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
Transgender Bill 2026: लोकसभा के मौजूदा सत्र में 13 मार्च को पेश किए गए ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 ने देशभर में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस प्रस्तावित संशोधन में ट्रांसजेंडर पहचान की परिभाषा में बड़ा बदलाव सुझाया गया है, जिससे समुदाय के एक बड़े हिस्से में नाराज़गी और असुरक्षा की भावना देखी जा रही है।
क्या है नया Transgender Bill 2026?
सरकार द्वारा पेश इस संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें ‘जेंडर सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन’ यानी स्व-पहचान के अधिकार को मान्यता नहीं दी गई है। प्रस्तावित कानून के अनुसार अब ट्रांसजेंडर की परिभाषा सीमित कर दी गई है और इसमें मुख्य रूप से पारंपरिक सामाजिक-सांस्कृतिक समुदायों जैसे किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता को ही शामिल किया गया है।
इसके अलावा इंटरसेक्स व्यक्तियों को भी इस श्रेणी में रखा गया है, जबकि वे लोग जो स्वयं अपनी जेंडर पहचान तय करते हैं (सेल्फ-आइडेंटिफाइड), उन्हें इस नई परिभाषा से बाहर कर दिया गया है।
पहचान के लिए सख्त प्रक्रिया
Transgender Bill 2026 में पहचान प्रमाणपत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया को भी पहले से अधिक जटिल बना दिया गया है। अब किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर पहचान पत्र पाने के लिए पहले मेडिकल सुपरिटेंडेंट या सीएमओ से प्रमाणपत्र लेना होगा। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) द्वारा जांच के बाद ही पहचान पत्र जारी किया जाएगा।
साथ ही, जेंडर से जुड़ी किसी भी सर्जरी की जानकारी सीधे प्रशासन को देने का प्रावधान भी शामिल किया गया है। इसे लेकर निजता के अधिकार पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
सरकार का पक्ष क्या है?
सरकार का कहना है कि 2019 के Transgender Bill 2026 को लागू करने में कई व्यावहारिक कठिनाइयाँ सामने आईं। अधिकारियों के मुताबिक, पुरानी परिभाषा काफी अस्पष्ट थी, जिसके कारण वास्तविक जरूरतमंदों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने में परेशानी हो रही थी।
सरकार ने यह भी दावा किया है कि कुछ मामलों में बच्चों और वयस्कों का अपहरण कर उन्हें जबरन ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर किया जाता है और उनका आर्थिक शोषण किया जाता है। ऐसे मामलों को रोकने के लिए यह संशोधन जरूरी बताया जा रहा है।
2014 से अब तक का सफर
भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों को पहली बार 2014 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘नालसा’ फैसले के जरिए मान्यता मिली थी। इस फैसले में नागरिकों को अपनी जेंडर पहचान स्वयं तय करने का अधिकार दिया गया था और ट्रांसजेंडर समुदाय को ‘तीसरे जेंडर’ के रूप में मान्यता दी गई थी।
इसके बाद 2019 में केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के संरक्षण के लिए कानून बनाया, जिसमें स्व-पहचान को मान्यता दी गई थी, हालांकि पहचान प्रमाणपत्र के लिए प्रशासनिक प्रक्रिया भी रखी गई थी।
समुदाय की आपत्तियां और विरोध
नए Transgender Bill 2026 के खिलाफ देश के कई शहरों—दिल्ली, मुंबई, पुणे और हैदराबाद—में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह संशोधन उनके अस्तित्व और पहचान को ही चुनौती देता है।
दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई ट्रांस युवाओं ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि यह कानून उनके भविष्य को अनिश्चित बना देगा। उनका आरोप है कि संशोधन में इस्तेमाल की गई भाषा पूरे समुदाय को संदिग्ध और अपराधी की तरह प्रस्तुत करती है।
निजता और अधिकारों पर खतरा?
कानूनी विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के नालसा फैसले की भावना के खिलाफ है। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति की जेंडर पहचान तय करने का अधिकार उसका व्यक्तिगत और संवैधानिक अधिकार है, जिसे इस संशोधन के जरिए सीमित किया जा रहा है।
कुछ वकीलों ने यह भी आशंका जताई है कि कानून में दंडात्मक प्रावधान इतने अस्पष्ट हैं कि इसका दुरुपयोग हो सकता है और ट्रांस समुदाय के लोग अनावश्यक रूप से कानूनी पचड़ों में फंस सकते हैं।
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